सोचते हो क्यूँ

क्या होगा अगर मैंने ये किया,

क्या होगा अगर मैंने वो नहीं किया..

क्या होगा अगर मैं एक दिन करूँ वही जो दिल करे,

क्या होगा अगर वो नहीं किया जो बांकी सब कहें,

क्या होगा अगर आज कर लूं मन की,

हँस लूं दिल खोल के, फिक्र छोड़ दूं जग की..

क्या होगा अगर…..

सोचते हो क्यूँ??

ज़िन्दगी है जी लो जी भर के एक एक लम्हा,

सोचते हो क्यूँ?

वो एक दिन

कटते कटते और गिनते गिनते

सोचते सोचते और कहते कहते,

पहले थोड़ा ये कर लूं और उसके बाद थोड़ा वो भी,

इसकी फिक्र करूं और उसकी भी

कुछ ये समेटू कुछ वो भी,

बिखरे बिखरे से ये लम्हे और कुछ अनसुलझी पहेलीयां

इन सब के बीच हमेशा रहती गिन,

जीऊँगी जी भर के वो एक दिन……